हमारे मोबाइल फोन में एंटीना क्यों नहीं होता? जानिए इसके पीछे की असली तकनीक

Why Mobiles do not have antenna

एक समय वह भी था जब छुट्टी वाले दिन दूरदर्शन पर कोई पसंदीदा प्रोग्राम देखते समय अचानक टीवी की स्क्रीन पर झरझराहट शुरू हो जाती थी। पिक्चर और साउंड का तालमेल बिगड़ते ही हम भागते थे अपनी छत की तरफ, जहाँ लोहे के बड़े से एंटीना को एक खास एंगल पर सेट करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। उस दौर में रेडियो से लेकर पुराने ब्लैक एंड व्हाइट टीवी तक, हर गैजेट के सिर पर एक लंबा एंटीना तना रहता था।

यहाँ तक कि 90 के दशक के शुरुआती मोबाइल फोन्स (जैसे नोकिया के पुराने मॉडल) में भी ऊपर एक छोटा सा प्लास्टिक का एंटीना निकला रहता था।

लेकिन आज हम बिना किसी बाहरी तार या लंबे एंटीना के, ना सिर्फ हाई-डेफिनिशन वीडियो देख रहे हैं बल्कि सात समंदर पार बैठे किसी भी व्यक्ति से बिना किसी रुकावट के लाइव वीडियो चैट भी कर लेते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे मोबाइल फोन में अब एंटीना क्यों नहीं होता? क्या स्मार्टफोन कंपनियों ने एंटीना लगाना पूरी तरह बंद कर दिया है?

आइये, इसके पीछे छिपे बेहद दिलचस्प वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग कारणों को बहुत ही आसान शब्दों में समझते हैं।

क्या वाकई हमारे फोन में एंटीना नहीं होता?

सबसे पहले इस भ्रम को दूर करते हैं- ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आपके मोबाइल फोन में एंटीना नहीं होता। सच तो यह है कि आज के एक आधुनिक स्मार्टफोन के अंदर एक नहीं, बल्कि 4 से 5 अलग-अलग एंटीना लगे होते हैं (जैसे 4G/5G सेलुलर नेटवर्क के लिए, वाई-फाई के लिए, ब्लूटूथ के लिए और जीपीएस ट्रैकिंग के लिए)।

फर्क सिर्फ इतना है कि अब ये एंटीना बाहर दिखने के बजाय आपके फोन की पतली बॉडी के अंदर ही बेहद चालाकी से छिपा दिए जाते हैं। इन्हें हम Internal Antennas कहते हैं।

लंबे एंटीना गायब होने के पीछे का असली विज्ञान

पुराने जमाने के लंबे एंटीना के गायब होने और फोन के स्लिम होने के पीछे फिजिक्स और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग का एक सीधा सा नियम काम करता है:

“जितनी उच्च स्तर की आवृत्ति (Higher Frequency), एंटीना का साइज उतना ही छोटा।”

रेडियो और मोबाइल कम्युनिकेशन पूरी तरह से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स (Electromagnetic Waves) यानी विद्युत चुंबकीय तरंगों पर काम करता है। इन तरंगों की अपनी एक आवृत्ति (Frequency) और तरंगदैर्ध्य (Wavelength) होती है। एंटीना इंजीनियरिंग का यह बेसिक नियम है कि किसी भी एंटीना का साइज, उस सिग्नल की वेवलेंथ का आधा या एक-चौथाई होना चाहिए ताकि वह सिग्नल को सही से कैच कर सके।

  • पुराना दौर (Low Frequency = Big Antenna): पुराने टीवी और रेडियो सिग्नल्स बहुत कम फ्रीक्वेंसी (जैसे 100 MHz से 200 MHz) पर काम करते थे। कम फ्रीक्वेंसी का मतलब था कि उनकी वेवलेंथ बहुत लंबी होती थी। इसी वजह से उन्हें कैच करने के लिए हमें छत पर 5-6 फीट लंबे एल्युमिनियम के एंटीना लगाने पड़ते थे।
  • आधुनिक स्मार्टफोन युग (High Frequency = Micro Antenna): आज का हमारा मोबाइल नेटवर्क (4G और 5G) बहुत ही हाई फ्रीक्वेंसी बैंड्स (जैसे 1800 MHz, 2400 MHz से लेकर 3500 MHz या उससे भी ऊपर) पर काम करता है। फ्रीक्वेंसी इतनी ज्यादा होने के कारण इसकी वेवलेंथ घटकर महज़ कुछ सेंटीमीटर या मिलीमीटर रह जाती है। यही वजह है कि अब एंटीना का साइज घटकर सिर्फ 1 से 2 सेंटीमीटर का रह गया है, जिसे फोन के मदरबोर्ड (PCB) पर ही आसानी से प्रिंट कर दिया जाता है।

स्मार्टफोन के अंदर एंटीना कहाँ छिपा होता है?

अगर आप अपने फोन को ध्यान से देखेंगे, तो आपको इसकी बॉडी पर कुछ खास इंजीनियरिंग डिजाइन्स दिखाई देंगे:

  1. प्लास्टिक की पट्टियां (Antenna Lines): अगर आपके पास मेटल बॉडी वाला फोन है (जैसे आईफोन या पुराने एचटीसी-वनप्लस के मॉडल), तो आपने फोन के पीछे या साइड के किनारों पर बारीक उजली या काले रंग की प्लास्टिक लाइन्स देखी होंगी। मेटल (धातु) सिग्नल्स को ब्लॉक करता है, इसलिए इंजीनियर्स फोन की मेटल बॉडी को बीच में काटकर वहां प्लास्टिक की बारीक पट्टी डाल देते हैं। इसके ठीक पीछे अंदर छुपा हुआ इंटरनल एंटीना सिग्नल्स को बिना किसी रुकावट के कैच करता है।
  2. मदरबोर्ड पर प्रिंटेड चिप( Microstrip Patch Antennas): आज के स्लिम फोन्स के अंदर छोटे-छोटे पैच एंटीना सीधे फोन के इंटरनल सर्किट बोर्ड पर ही लगा दिए जाते हैं। ये इतने पतले और छोटे होते हैं कि आपके फोन की थिकनेस (मोटाई) पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

नेटवर्क को घना करना: सेल टॉवर्स का जाल

एंटीना छोटा होने के साथ-साथ एक और बड़ा बदलाव हमारे आसपास हुआ है- घने मोबाइल टावरों का नेटवर्क। पहले के समय में एक शहर में गिने-चुने टीवी या रेडियो टावर होते थे, इसलिए कमजोर सिग्नल को खींचने के लिए बड़े एंटीना की जरूरत होती थी।

आज की तारीख में हर 1-2 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल कंपनियों ने बेस स्टेशन और सेल टावर्स खड़े कर दिए हैं। सिग्नल की ताकत इतनी मजबूत होती है कि आपके फोन के अंदर बैठा छोटा सा नन्हा एंटीना भी बिना किसी परेशानी के फुल नेटवर्क खींच लेता है।

निष्कर्ष

तकनीक के क्रमिक विकास ने भारी-भरकम और असुविधाजनक लोहे के तारों को बेहद स्लिम और इंटेलिजेंट माइक्रो-चिप्स में बदल दिया है। हमारे मोबाइल से एंटीना गायब नहीं हुआ है, बल्कि वह विज्ञान और मॉडर्न आर्किटेक्चर की बदौलत इतना एडवांस हो गया है कि अब हमें उसकी मौजूदगी का अहसास तक नहीं होता।

टेकमोहल्ला  पर हमारा प्रयास हमेशा यही रहता है कि हम आपके रोजमर्रा के तकनीकी सवालों के पीछे के जटिल विज्ञान को एकदम सरल और सुलभ भाषा में आपके सामने लाएं।

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